Wednesday, 9 November 2016

प्रारंभ




आज पहली बार
शुरुआत की थी
उसने
दर्द बाँटने की,
वो औरत थी
और औरत की कहानी
बुनना चाहती थी,
झक सफेद पन्ने में
लिखी इबारत
लहू का रंग दे रही थी,
और हर लफ्ज़ डूबा
ख़ामोश दर्द में,
कलम से रिसती स्याही
अश्क थे उसके,
और नज़्मे भरी थी
सिसकियाँ से,
वो आज भी लड़ रही थी
उस मुकाम के लिये,
जो बुना तो गया
उसके लिये,
पर तोड़ लिये गये
'पाये' मुकाम के,
आज पहली बार
डर के साये से दूर
उसने
शुरुआत की 
अपनी लड़ाई की।

डा.कुसुम जोशी
गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश)

2 comments:

  1. Too good bhabhi............ congr8888888888s

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    1. दिल से आभार आपका आदरणीया.

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