Sunday, 22 March 2015

जीवन





प्रभुजी मेरे तन साँस-साँस भ्रम हरो।। 

सुन्दर विशाल भवन-सा स्वस्थ शरीर बनाया, 
पाँच उद्यान पाँच बाजार से तन को सजाया,  
पाँच कोट की काया, पाँच दोष से उढ़ाया,  
नाथ मेरे दूषित तन को शुद्ध करो,  
प्रभुजी मेरे तन साँस-साँस भ्रम हरो।। 

नौ द्वार भवन मध्य तीन खण्डों में बँटाया, 
हर द्वार हाथ पसारा प्रेम भिक्षा ले आया,  
राग-द्वेष की दीमक चाट रही चित घबराया,  
आन प्रभु अब मेरा चित्त शांत करो,  
प्रभुजी मेरे तन साँस-साँस भ्रम हरो।। 

पाँच माला सदन और एक रक्षक बैठाया, 
बना बैठा गृह स्वामिनी काहे दुःख सताया,  
मुक्त गगन में उड़ अंतस मध्य गोता लगाया,  
पिंजरा तोड़ कर पंछी उड़ान भरो, 
प्रभुजी मेरे तन साँस-साँस भ्रम हरो।। 

इंदु रचित पद सुन्दर ज्ञान भर अन्दर,  
कूट कर चेतस भाव मन अन्दर धरो  
प्रभुजी मेरे तन साँस-साँस भ्रम हरो।। 

********* सुरेश चौधरी 

(रक्षक=प्राण, ९ द्वार = २ आँखें, २ नाक छिद्र, २ कान १ मुँह, १ गुदा, १ जनेन्द्रिय ३ खंड = त्रीगुण, सत-रज-तम, ६ परिवार = मन, दृष्टि, स्वाद, गंध, शब्द, स्पर्श ५ बाजार = ५ कर्मेन्द्रियाँ ५ तत्त्व = क्षिति, जल, गगन, पावक, समीर, १ गृहस्वामिनी= भौतिक सुख)

Monday, 16 March 2015

बाकी झलक अनोखेपन की




झलक रही छवि देख थके हम,
ललक भरे नैनन की;
बाकी झलक अनोखेपन की
दारुण दाह लिए,
बिछोह की आह लिए;
चित्त कुछ अधीर है,
अकथ कोई पीर है;
नेत्र में न नीर है,
शिथिल ज्यों शरीर है;
कथा-व्यथा है मानो;
एक वियोगी जन की
बाकी झलक अनोखेपन की
कह न सकी कुछ,
सुन न सकी कुछ,
रही मूक हलचल सी;
प्रकृति संग भी
निपट अकेली;
पावन गंगाजल सी
है ज्वालामुखी,
या उसकी चिंगारी;
मित्र कहो, है पुरुष;
या कह लो नारी!
रही प्रतीक्षा उभय दिशा से;
आलिंगन के क्षण की
बाकी झलक अनोखेपन की

*** हरिहर तिवारी ***

Sunday, 8 March 2015

होली गीत





 
रंगों से भीगी अरुणाई ख़ुशियों की बरसात हो गई।
रंग-रूप-रस सुभग सलोने गीतों की सौगात हो गई।
 
गालों का है रंग गुलाली,
मदमाती सी चाल मराली,
चूनर पट है भीगी धानी,
होठों पर लिपटाये लाली।
श्याम-सलोने मोहन के संग राधा ज्यों जलजात हो गई।
प्रीति-रीति की कुंज गली में हर्षाई सी प्रात हो गई।
 
ब्रज में धूम मचाये होरी,
नाचै महुआ नीम निबौरी,
रंग अबीर गुलाल उड़ावै,
मोहन के संग ब्रज की गोरी।
मोहन लिए गुलाल अबीरा राधा मोहक गात हो गई।
नैनों में छलकै मधुरामृत प्रीति परागत प्रात हो गई।
 
मोहन ने मारी पिचकारी,
भीग रही है राधा प्यारी,
ग्वाल बाल सब भंग पिए हैं,
गोपी इन्द्रधनुष सी क्यारी।
मन से मन के तार मिल गए ख़ुशियों की बारात हो गई।
मधुराक्षर में श्याम-सलोने भावों की सौगात हो गई।
 
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विद्या प्रसाद त्रिवेदी ● ----------

प्रेम होना चाहिए

धन नहीं धरती नहीं मुझको न सोना चाहिए हर हृदय में सिर्फ सच्चा प्रेम होना चाहिए स्वार्थ का है काम क्या इस प्रेम के संसार में...