Monday, 9 January 2012

पाँच छोटी कविताएँ - मेरी चाहत


(1)

मैंने चाहा तुम्हें,
शायद ये मेरी बदक़िस्मती है,
क्या सोचते हो?
मुझे चाहने वाला कोई नहीं?
हर तरफ़ मेरा दीदार सितम ढाता है,
जान न्योछावर हर अदा पर होता है,
मगर, बदनसीबी मेरी,
मैं तुम्हें चाहता हूँ,
और तुम हो कि,
बिला-वजह मिझसे खिंचते हो।

(2)

सोचो ज़रा,
बस एक बार तो सोचो,
बग़ैर तुम्हारे,
मेरी ज़िन्दगी क्या होगी?
एक ठूँठ-सी,
जिस पर न पत्ते उग सकते हैं'
और न ही फूल।

(3)

यह सोचकर तुम,
दो शब्द ख़त में न लिख सके,
कि, मैं तुम्हें भूल पाऊँगा,
मैंने ख़त लिखकर भी,
अपने पास रखा है,
क्या तुमने कभी ऐसे ख़तों का,
दर्द महसूस किया है?

(4)

चलो मान लिया,
मैं तेरा प्यार नहीं,
चलो मान लिया,
मैं तेरे अनुसार नहीं,
लेकिन,
मेरे दिल में जो प्यार है,
वह बस तेरे लिए है,
चाहे कुछ न करो,
कम से कम दीदार तो करने दो।

(5)

अब क्या करूँ?
और कैसे चाहूँ?
जी-जान से चाहता हूँ,
धर्म-ओ-ईमान से चाहता हूँ,
शायद तुम्हें यकीं तभी होगा,
जब मेरी लाश से वस्ता होगा।

विश्वजीत 'सपन'

Monday, 2 January 2012

चार छोटी कविताएँ - मानव


मानव





(१)

मैं भी मानव हूँ।
एहसास इसका,
इसलिए नहीं होता,
कि परिभाषा के अनुकूल मैं भी हूँ।
बल्कि, इसलिए होता है
क्योंकि मैं भी बेबस हूँ।






(२)

मैं भी मानव हूँ,
मैंने कहा,
सुना उसने,
फिर पूछा,
तुम मानव कैसे हो?
जब मानव, मानव का नहीं रहा,
तो तुम कैसे रहे?

(३)

ख़ुद को ख़ुद ने जाना,
ख़ुद ने पहचाना,
मानव, मानव को कब जानेगा?
मानव, मानव को कब पहचानेगा?

(४)

कौन है यह मानव?
क्या कभी वह जान पाएगा?
कभी इसका उत्तर पहचान पाएगा?
क्या वह कभी मानव का हो पाएगा?
युगों-युगों से यह अनुत्तरित प्रश्न,
क्या कभी उत्तरित हो पाएगा?
क्या यह सवाल, सवाल ही रह जाएगा?
इस अनबूझ पहेली वाली दुनिया में,
जीवन के अनमोल बोल वाली दुनिया में,
जहाँ जीवन का मोल न रह गया हो?
जहाँ मानवता के बोल न रह गए हों?
काश! मानव, मानव को जान पाता,
तो आतंकवाद का साया न छा पाता।

विश्वजीत 'सपन'

दिल मेरे

  सो जाता जब ये जग सारा, घर, आँगन, पनघट, चौबारा । सुधियों में स्पंदित पल-पल, दिल मेरे! तू ही होता है । खेता है तू सुख की नौका, द...