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शहीद दिवस

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आज शहीदी दिवस साथियो, भगत सिंह से वीरों का।
राजगुरू, सुखदेव सरीखे, वतनपरस्त फकीरों का।
जब भारत की, महाघोष की ये हुंकारें भरते थे।
गोरे अफसर इनके डर से, थर-थर काँपा करते थे।

आजादी की खातिर इनने, हँस-हँस के बलिदान दिया।
भारत के तीनो बेटों ने, एक साथ प्रस्थान किया।
इन मतवाले वीरों की इस, कुर्बानी का ध्यान रहे।
हाथ तिरंगा औ होंठों पर, भारत का जयगान रहे।

***** रणवीर सिंह (अनुपम)

न तेरा न मेरा

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यही झगड़ा सदा से है कि तेरा है कि मेरा है
समझता पर नहीं कोई कि चिड़िया का बसेरा है

लिखा लेते वसीयत हम सभी घर बार दौलत की
मगर ले कुछ नहीं जाते हमें लालच ने घेरा है

नहीं मालूम अगले पल यहाँ होंगे वहाँ होंगे
निभाने को किया वादा नहीं होता सवेरा है 

कफ़न के बाद भी ख़्वाहिश बची रहती ज़माने की
दफ़न के बाद भी रहता यहीं दो गज़ का डेरा है 

भुला देता ज़माना हर किसी को बाद मरने के
मगर रहता वही है याद जिसका दिल में डेरा है

*** अशोक श्रीवास्तव, रायबरेली

पाँच कह मुकरिया - होली विशेष

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(1)
मैं उस पर जाऊँ बलिहारी,
डाले रँग भर-भर पिचकारी,
बचे न साबित मेरी चोली,
ए सखि साजन? नहिं सखि होली।।1।।
(2)
आकर मुझको भंग पिलाए,
अजब-गजब फिर मस्ती छाए,
पकड़ा धकड़ी हँसी ठिठोली,
ए सखि साजन? नहिं सखि होली।।2।।
(3)
उसके संग करूँ मैं मस्ती,
मिट जाती मेरी सब हस्ती,
चेहरा बन जाता रँगोली,
ए सखि साजन? नहिं सखि होली।।3।।
(4)
दिन भर मुझको भंग पिलाए,
तन मन मेरा खिल-खिल जाए,
तंग लगे तब गीली चोली,
ए सखि साजन? नहिं सखि होली।।4।।
(5)
गुझिया मीठा खूब खिलाए,
रंग लगाकर गले लगाए,
ठंडाई में डाले गोली,
ए सखि साजन? नहिं सखि होली।।5।।

**हरिओम श्रीवास्तव**

साथी/मित्र पर पाँच दोहे

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सच्चा साथी राखिए, दुख में दे जो साथ।
एक विभीषण मिल गया, धन्य हुए रघुनाथ।।

कृष्ण सुदामा थे सखा, जग में है विख्यात।
बड़ भागी को ही मिले, ऐसी प्रिय सौगात।।

संकट में जो साथ दे, उसको साथी मान।
राह दिखाए सत्य की, जग में हो सम्मान।।

साथी मेरे हैं कई, सच्चा नहि है एक।
फूक-फूक कर चल रहा, मन में लिए विवेक।।

कड़वी बोली भी भली, जो हो सच्चा मित्र।
सत पथ गामी हम रहें, बनता दिव्य चरित्र।।

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*** मुरारि पचलंगिया

एक गीत - किस्से कहानी के

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पुराने
दिन कभी इस पेड़ के भी,
थे जवानी के।

बसंती किसलयों ने थे,
दिए हँसकर मृदुल गहने,
लजीली फूँल गंधों संग,
हवाएँ थी लगी बहने।

यहीं पर,
खेलता था खेल सावन,
धूप पानी के।

सवेरे व्योम पाँखी,
डाल पत्ती पर उतरते थे,
दिशाओं में मधुर संगीत,
के सरगम सँवरते थे।

यहीं पर,
दीप जलते मंत्र पढ़ते,
माँ भवानी के।

समय गुज़रा कि दिन बदले,
हवा बदली झरे पत्ते,
हुई कंकाल देही पर,
हवाओं के वही रस्ते।

हुए बस,
फूल फल तन पात्र अब,
किस्से कहानी के।

*** बृजनाथ श्रीवास्तव

कामयाबी

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ख़्वाहिशों के पर लगा परवाज़ जो भरता रहा है
चाँद छूने का इरादा दिल में जो रखता रहा है
आँधियाँ हों या कि तूफ़ाँ पर कभी डरता नहीं जो
कामयाबी मुट्ठियों में वो सदा करता रहा है 

*****प्रमिला आर्य*****

आशा/उम्मीद के भाव पर एक रचना

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नाना विधि धोया अंगन को, मल-मल के तन स्नान कियो।
फिर समय उचित परिधान पहन, प्रभु का मन से गुणगान कियो।
आँगन में तुलसी को पूजा, हर्षित मन से जलदान कियो।
मन में ले कुशल कामना फिर, परदेशी पिय को ध्यान कियो।

श्यामल केशों का नीर छटक, फिर नूतन चोटी गुहि डाली।
कंगन, चूड़ी, झुमकी पहनी, फिर नाक में नवनथनी डाली।
मुख पे मयंक, कुंदन काया, होठों पे चमके कछु लाली।
सोलह शृंगार करे गोरी, पिय अगवानी में मतवाली।

*** रणवीर सिंह 'अनुपम' ***